Monday, November 9, 2009

प्रिय आदित्य, रजनीश  और वंदना,
                                  आप सभी के सवालों के जवाब बहुत संक्षेप में  एक साथ दे देता  हु.

१.आदित्य मन को एकाग्र करने की कोशिश बिलकुल मत करो बल्कि पहले यह देखो की मन की गति और रूचि  किस और हे ?  और वह क्या चाहता हे? मेरे प्यारे दोस्त,  मन से लडो मत, और न ही मन के साथ जबरदस्ती  करो. मन के साथ कुश्ती मत करो उसके साथ  दुश्मन के जैसे बर्ताव मत करो, मन को दोस्त बनाओ, उसकी बात सुनो, मन को समझो, फिर अपने आप ही मन एकाग्र होने लगेगा. मेरे दोस्त यह ताकत का मामला नहीं प्रेम का मामला हे, मन ताकत की भाषा नहीं समझता हे बल्कि केवल और केवल प्रेम की भाषा समझता हे, 

२. रजनीश, ख़ुशी से जीने की सबसे बड़ी कला हे, लोगो से कुछ भी उम्मीदे मत करो, बल्कि किसी से भी कुछ उम्मीद  मत करो, में तो यहाँ तक कहुगा की भगवान से भी कुछ भी आशा मत रखो, सारी आशाये व अपेक्षाए एक दिन हमें नरक में ले जाती हे, ये  हमें बोझिल बनती हे.समस्त आग्रह दुराग्रह हे  जो इन्सान , हर हाल में खुद से ही  संतुष्ट रहना जानता हे, समझो की उसने खुश रहने की कला सीख  ली हे,यदि आज तुम नरक में जी रहे हो तो इसके जिम्मेदार केवल तुम हो और कल यदि तुम स्वर्ग में जीने लगोगे तो उसके जिम्मेदार भी तुम ही होगे. हमारे सुखो और दुखो के लिए केवल हम ही जिम्मेदार हे कोई और नहीं .   

3.वंदना तुमने वैवाहिक जीवन की समस्या के बारे में पूछा हे, पर यदि हम समझदारी से नहीं चले तो विवाह अपने आप में एक बड़ी समस्या हे, तुमने सुना हे यह शब्द '' विवाह-बंधन '' अब कुछ समझ आया ? विवाह सम्बन्ध नहीं एक बंधन हे ! यदि तुम सार्वजानिक रूप से मेरा उत्तर विस्तार से जानना चाहती हो तो में इस  ब्लॉग में उत्तर दूंगा और यदि तुम व्यक्तिगत रूप से  जवाब चाहती हो तो कृपया मुझे  god_from_indore@yahoo.co.in पर ईमेल करो.

1 comment:

  1. स्वामीजी ,मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद...कोशिश करूँगा ऐसे जीने की....

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